सैयद अल-ए अहमद – हर एक दुख ने किसी अजीब मोह में मुझे छुआ

हर एक दुख ने किसी अजीब मोह में मुझे छुआ,
हे मेरी आत्मा की चाह — किसने इतना सताया मुझे?

इतनी नफ़रत तो कभी मेरे दिल में नहीं थी,
सोच — किसने यह ज़हर पिलाया मुझे?

फिर कोई ताज़ा टीस दिल की तहों में उतर गई,
फिर किसी सपने ने आईना दिखाया मुझे।

किसने लूटा है मेरे विचारों की पवित्रता?
ओ मेरे तपते दिल — किसने चुरा लिया मुझे?

तेरी चीख़ें भी एक दिन ये दुनिया सुनेगी,
अगर तूने मुझे रुलाया है, हे समझौतावादी!

मैं बस यही सोचकर चुप हूँ — किसी भी तरह सही,
दर्द के गुम्बद पर शायद मुझे सजाया गया है।

जब भी कोई चालाकी की छाया मुझ पर पड़ी,
तब भी पहचान ने मुझे अपनी लपटों में पाया।

मैं तो सिर से पाँव तक बस तेरा ही था,
ओ संकीर्ण हृदय — तूने ही मुझे खो दिया।

उसके घर में भी किसी दुख की स्याही भर दे,
क्योंकि रात की दहलीज़ का पत्थर ही तो बनाया गया हूँ मैं।

तू मेरा कैसा ईश्वर है? बता मेरी भूल,
जिसने पूरी ज़िंदगी ऊँचाइयों से गिराया मुझे।

किसके प्रेम में कमी रह गई, अहमद?
किसने मेरी चुप्पी को जलती चिंगारी बना दिया?

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